‘समुद्र मंथन’ – राष्ट्रीय अपतटीय अन्वेषण योजना 

पाठ्यक्रम: GS3/अर्थव्यवस्था

समाचार में

  • केंद्रीय मंत्रिमंडल ने वित्तीय वर्ष 2030-31 तक के कार्यान्वयन हेतु ₹84,084 करोड़ के स्वीकृत परिव्यय के साथ ‘समुद्र मंथन’ – राष्ट्रीय अपतटीय अन्वेषण योजना को मंजूरी प्रदान की है।

अपतटीय अन्वेषण

  • अपतटीय अन्वेषण से अभिप्राय समुद्र तल के नीचे स्थित प्राकृतिक संसाधनों, विशेषकर कच्चे तेल , प्राकृतिक गैस तथा समुद्री तल के खनिजों की खोज से है।
  • इसमें समुद्री जल के नीचे छिपे संभावित भंडारों की पहचान एवं मूल्यांकन के लिए वाणिज्यिक ड्रिलिंग अथवा दोहन से पूर्व जटिल भूवैज्ञानिक, भू-भौतिकीय तथा अभियांत्रिकी तकनीकों का उपयोग किया जाता है।

अपतटीय अन्वेषण के लाभ

  • ऊर्जा सुरक्षा: अपतटीय संसाधनों का दोहन राष्ट्रीय ऊर्जा आत्मनिर्भरता को सुदृढ़ करता है तथा वैश्विक भू-राजनीतिक संघर्षों, आपूर्ति शृंखला में व्यवधानों एवं कच्चे तेल की अस्थिर अंतरराष्ट्रीय कीमतों पर निर्भरता को कम करता है।
  • आर्थिक विकास: बड़े अपतटीय परियोजनाएँ प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) को आकर्षित करती हैं, उच्च कौशल आधारित रोजगार सृजित करती हैं तथा रॉयल्टी, करों एवं कॉर्पोरेट लाभ के माध्यम से सरकारी राजस्व में वृद्धि करती हैं।
  • विशाल अप्रयुक्त क्षमता: अपतटीय बेसिनों में विश्व के अब तक अप्रयुक्त हाइड्रोकार्बन भंडारों तथा समुद्री तल पर स्थित दुर्लभ मृदा खनिजों की पर्याप्त संभावनाएँ विद्यमान हैं।
  • प्रौद्योगिकीय प्रगति: अपतटीय गतिविधियाँ समुद्र-तल अभियांत्रिकी, रोबोटिक्स, भूकंपीय इमेजिंग तथा समुद्री लॉजिस्टिक्स में तकनीकी नवाचार को प्रोत्साहित करती हैं, जिससे घरेलू विनिर्माण एवं सहायक सेवा क्षेत्रों का विकास होता है।
  • ऊर्जा संक्रमण में सहायक: अपतटीय प्राकृतिक गैस की खोज स्वच्छ दहनशील संक्रमण ईंधन के रूप में कार्य करती है, जो पारंपरिक जीवाश्म ईंधनों एवं शून्य-उत्सर्जन नवीकरणीय ऊर्जा प्रणालियों के बीच सेतु का कार्य करती है।

चुनौतियाँ

  • वित्तीय जोखिम: गहरे समुद्री क्षेत्रों में ड्रिलिंग हेतु अरबों डॉलर के प्रारंभिक निवेश, लंबी परियोजना अवधि तथा अन्वेषण के प्रारंभिक चरणों में ‘शुष्क कुओं ‘ की उच्च संभावना रहती है।
  • प्रौद्योगिकीय चुनौतियाँ: उच्च दाब, निम्न तापमान तथा अति-गहरे समुद्री वातावरण में अत्याधुनिक तकनीक, विशेषीकृत ड्रिलिंग रिग तथा जटिल समुद्र-तल अवसंरचना की आवश्यकता होती है।
  • पर्यावरणीय जोखिम: समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र भूकंपीय सर्वेक्षण, अपशिष्ट उत्सर्जन, जलमग्न ध्वनि प्रदूषण तथा समुद्री तेल रिसाव जैसी गंभीर चुनौतियों से प्रभावित हो सकते हैं।
  • भू-राजनीतिक विवाद: अनेक अपतटीय बेसिन विवादित विशिष्ट आर्थिक क्षेत्र (EEZ), समुद्री सीमाओं तथा रक्षा-संवेदनशील प्रतिबंधित क्षेत्रों से जुड़े होते हैं।
  • ऊर्जा संक्रमण की गतिशीलता: वैश्विक स्तर पर नवीकरणीय ऊर्जा की ओर बढ़ते संक्रमण के कारण दीर्घकालिक मांग को लेकर अनिश्चितता बनी रहती है, जिससे निजी निवेशक दीर्घावधि अपतटीय परियोजनाओं में निवेश करने से हिचकिचाते हैं।

सरकार द्वारा उठाए गए कदम

  • ‘समुद्र मंथन’ योजना:  यह पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय की एक केंद्रीय क्षेत्र योजना है।
    • यह भारत की अपतटीय ऊर्जा क्षमता के दोहन की परिकल्पना से प्रेरित है तथा ऊर्जा सुरक्षा को सुदृढ़ करने एवं विकसित भारत के लक्ष्य को समर्थन प्रदान करने का उद्देश्य रखती है।
    • योजना के प्रमुख घटक: ₹28,534 करोड़ के परिव्यय से आधुनिक अपतटीय भूकंपीय आँकड़ों का संग्रहण एवं प्रसंस्करण।
      • ₹43,200 करोड़ के आवंटन से 60 गहरे समुद्री अन्वेषण कुओं की ड्रिलिंग, जिसमें पात्र ड्रिलिंग लागत का 50% अथवा प्रति कुआँ ₹675 करोड़ (जो भी कम हो) तक सरकारी सहायता प्रदान की जाएगी।
      • खोजे गए संसाधनों के वाणिज्यीकरण को सुगम बनाने हेतु ₹10,000 करोड़ की लागत से साझा अपतटीय अवसंरचना केंद्रों का विकास।
      • घरेलू विनिर्माण एवं महत्त्वपूर्ण उपकरणों तथा सेवाओं के स्थानीयकरण को प्रोत्साहित करने के लिए ₹2,000 करोड़ के परिव्यय से तेल एवं गैस विनिर्माण तथा सेवा क्षेत्र की स्थापना।
    • उद्देश्य: 600 मिलियन मीट्रिक टन तेल समतुल्य (MMTOE) से अधिक अपतटीय संसाधनों का दोहन कर भारत की ऊर्जा सुरक्षा को सुदृढ़ बनाना तथा घरेलू तेल एवं गैस उत्पादन में वृद्धि करना।
      • आयात निर्भरता को कम करना, रोजगार सृजन करना, निवेश आकर्षित करना तथा स्वदेशी अपतटीय प्रौद्योगिकियों के माध्यम से मेक इन इंडिया को प्रोत्साहित करना।
      • वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी ऊर्जा पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण करना तथा भारत की दीर्घकालिक आर्थिक वृद्धि को गति प्रदान करना।
  • अपतटीय क्षेत्रों को अन्वेषण हेतु खोलना: पूर्व में प्रतिबंधित ‘नो-गो’ क्षेत्रों के 99% से अधिक हिस्से को अन्वेषण हेतु खोल दिया गया है, जिससे पहली बार भारत के विशिष्ट आर्थिक क्षेत्र (EEZ) के 10 लाख वर्ग किलोमीटर से अधिक क्षेत्र में अन्वेषण संभव हो सकेगा।
  • संविदात्मक व्यवस्था का आधुनिकीकरण: भारत ने उत्पादन साझेदारी अनुबंध (PSC) से राजस्व साझेदारी अनुबंध (RSC) व्यवस्था को अपनाया है, जिससे राजकोषीय ढाँचा सरल, अधिक पारदर्शी तथा प्रशासनिक हस्तक्षेप न्यूनतम हुआ है।
  • विधायी सुधार: तेल क्षेत्र (विनियमन एवं विकास) (संशोधन) अधिनियम, 2025 के माध्यम से इस क्षेत्र की विधिक व्यवस्था का आधुनिकीकरण किया गया है। इसके अंतर्गत संविदात्मक स्थिरता सुनिश्चित करने, एकीकृत पेट्रोलियम परिचालनों को मान्यता देने, विवाद समाधान तंत्र को सुदृढ़ करने तथा आधुनिक नियामकीय ढाँचा स्थापित करने का प्रावधान किया गया है।
  • नए नियमों के माध्यम से कार्यान्वयन: पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस नियम, 2025 द्वारा इन सुधारों को लागू किया गया है, जिससे कारोबार सुगमता , नियामकीय दक्षता तथा पेट्रोलियम पट्टों के प्रशासन को अधिक सरल एवं प्रभावी बनाया गया है।
  • एकरूप निर्णय-निर्माण व्यवस्था: सरकार ने सभी संविदात्मक व्यवस्थाओं के अंतर्गत सचिवों की अधिकारप्राप्त समिति की संरचना एवं कार्यादेश को मानकीकृत किया है, जिससे सभी परिचालकों के लिए समान अवसर एवं निर्णय प्रक्रिया में एकरूपता सुनिश्चित हो सके।
  • अन्वेषण पर विशेष बल: ओएनजीसी तथा ऑयल इंडिया लिमिटेड के प्रदर्शन मानकों को पुनर्गठित कर अन्वेषण गतिविधियों पर अधिक बल दिया गया है, जिससे घरेलू हाइड्रोकार्बन संसाधनों के विस्तार के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता सुदृढ़ हुई है।

निष्कर्ष

  • अपतटीय अन्वेषण भारत की ऊर्जा सुरक्षा एवं आर्थिक विकास का एक रणनीतिक आधार है, क्योंकि यह घरेलू ऊर्जा संसाधनों की खोज को बढ़ावा देता है तथा आयात पर निर्भरता को कम करता है।
  • ‘समुद्र मंथन’ पहल का उद्देश्य कृष्णा-गोदावरी, कावेरी, महानदी एवं अंडमान जैसे अग्रिम अपतटीय बेसिनों में जोखिम-साझाकरण, उन्नत प्रौद्योगिकी एवं निवेश प्रोत्साहनों के माध्यम से अन्वेषण-आधारित विकास को गति देना है।
  • तथापि, सतत विकास के लिए संसाधनों के दोहन, पर्यावरण संरक्षण तथा स्वच्छ ऊर्जा की ओर संक्रमण के बीच संतुलन स्थापित करना आवश्यक है।
  • नवाचार, प्रभावी विनियमन एवं उत्तरदायी अपतटीय अन्वेषण भारत की ऊर्जा लचीलापन को सुदृढ़ करेंगे तथा विकसित भारत @2047 की परिकल्पना को साकार करने में सहायक सिद्ध होंगे।

स्रोत: TH

 

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